शुक्रवार, 21 जनवरी 2011


शक्ति प्रवाहित है करती

हरती तम को वह तार है हिन्दी ।

जो हिम से चली सागर लों

नहीं टूटी कभी वह धार है हिन्दी ॥

भारत माँ के गले में सुशोभित

हो रहा जो वह हार है हिन्दी ॥

जीवन जीवन सा लगता नहीं

जाके विना वह सार है हिन्दी ॥

सातों है रंग भरा हुआ इन्द्र का

ईश्वर की यह इच्छा है हिन्दी

भोले के भाल पे राजत हाथ के

खप्पर में यह भिक्षा है हिन्दी ।

है गुरुता गुरु द्रोण लिए

एकलव्य की निष्ठित शिक्षा है हिन्दी ।

सीता सी है निर्दोष परन्तु

ये सीता की अग्नि परीक्षा है हिन्दी ॥

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