मंगलवार, 14 दिसंबर 2010


जाके लखे से अघाये न दृष्टि

वही सुमनोरम दृश्य है हिन्दी ।

स्वाती के बूंद से मोती बने वह

ही जलराशि ये वृष्य है हिन्दी ।

यज्ञ की वेदी पे जो जलती

जगती के लिए वो हविष्य है हिन्दी ।

चेतो रे, चेतो, अभी से भी चेतो

कि भारत का ये भविष्य है हिन्दी ।

1 टिप्पणी:

  1. उमाशंकर जी बहुत ही सुंदर सवैया, जय हो आपकी| आप का छंदों के प्रति रुझान मनोहारी है| समस्यापूर्ति ब्लॉग पर अपना अमूल्य योगदान अवश्य दें|
    http://samasyapoorti.blogspot.com
    navincchaturvedi@gmail.com

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